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अजब, अनूठे, रहस्यमय एवं रोमांच से भरे गाँवों की कहानियां भाग- 6

बिहार का ईरान– किशनगंज, बिहार  

बिहार के किशनगंज में बिहार-बंगाल की सीमा पर एक छोटा सा गाँव है मोतीबाग कर्बला, जिसे बिहार का ईरान कहा जाता है। यहाँ के बाशिदों के दादा-परदादा मुगलकाल में हिन्दुस्तान आए थे और उसके बाद यहीं के होकर रह गए। अपनी संस्कृति को जिन्दा रखने के लिए यहाँ के लोग आपस में फारसी में बात करते हैं। साथ ही उनके खाने में भी आपको ईरानी खाने की महक मिल जाएगी जैसे कि चेलो कवाब एवं नाँन।

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 अपनी कबाइली संस्कृति को जीता है ये गाँव

कुछ साल पहले तक ये लोग ईरानी कबायली तंबू बनाकर रहते थे। हालाँकि वे काफी खर्चीले होते हैं इस कारण अब ये लोग साधारण झोपड़ी बना कर रहते हैं। बात अगर इनके काम-धंधे की करें तो इनका मुख्य पेशा शीशे और पत्थर की खुबसूरत कारीगरी का है।

सपना है एक बार ईरान जाने का

अपने पुरखों के देश जाने के लिए काफी गंभीर यहाँ के नौजवान अपनी जड़ों की तलाश में ईरान जाना चाहते हैं। इंटरनेट के ज़रिए ये अपने पुरखों के शहर शिराज़ के बारे में जानने की कोशिश करते रहते हैं। उनका कहना है कि भला कौन एक बार वहां नहीं जान चाहेगा जहां उसकी जड़े हैं। अपने घर–आंगन को हमेशा ईरानी कबाइली संस्कृति से महकाने वाले ये ईरानी खुद को इंडियन ईरानी कहलाना पसंद करते है।

 

 यहाँ बसता है हिन्दुस्तान में अफ्रीका- जूनागढ़, गुजरात  

पारंपरिक अफ्रीकन वेश-भूषा, चेहरे पर वही अफ्रीकन पेंटिंग और नृत्य का भी वही अफ्रीकन अंदाज़। जैसे ही आपकी नज़र इनके चेहरे पर पड़ती है आपको लगता है कि आप अफ्रीका के किसी गाँव में है। ये अफ्रीकन सदियों से भारत में बसे हैं और भारतीय संस्कृति से इस कद्र जुड़ चुके हैं कि इन्हें न तो यहाँ की भाषा-बोली से परहेज़ है और न ही स्थानीय संस्कृति से। दिलचस्प बात ये है कि अपनी मिटटी से हजारों मील दूर विविधताओं वाले भारतदेश में भी इन्होंने अपनी संस्कृति को संजो कर रखा है।

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भारत में इनका इतिहास

भारतीय इतिहास के अनुसार ये दशकों पहले जूनागढ़ गुजरात के नवाबों द्वारा अफ्रीका के केन्या से लाये गए गुलामों के वंशज हैं। शारीरिक मेहनत से जुड़े काम के अलावा अपने डील-डोल एवं लम्बे-चोड़े शरीर के कारण नवाबों द्वारा इन्हें कुशल योद्धा एवं अंगरक्षक के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता था।

खेती-बाड़ी और नृत्य, करतब से होता है गुज़ारा

जूनागढ़ से लगभग सौ किलोमीटर दूर गीर के जंगलों में इनका गाँव जम्बुर है। सामान्य खेती-बाड़ी के अलावा अपनी संस्कृति से जुड़े नृत्य, करतब दिखाकर गुजारा कर रहा ये अफ्रीकन समुदाय बहुत ही अच्छी तरह स्थानीय गुजरती भाषा में भी प्रवीण है।

सैलानियों के आकर्षण का केंद्र

आज ये गुजरात पर्यटन का एक अहम् हिस्सा हैं। गीर के जंगलों में आने वाले सैलानियों को इनकी संस्कृति से परिचित कराने के लिए कई स्थानीय होटल, रिसोर्ट इन्हें अपने यहाँ आमंत्रित करते है। हालाँकि कुल मिलकर इनकी स्थति काफी दयनीय है अफ्रीकन लोगों का ऐसा ही एक गाँव गर्दोली कर्णाटक के हलियाल नगर पंचायत में है जिसकी भी कमोवेश यहीं स्थिति है।

 

यहाँ है सिकंदर के वंशजों का गाँव- मलाणा, हिमाचल प्रदेश  

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के अति दुर्गम इलाके में स्थित है मलाणा गाँव। इसे भारत का सबसे रहस्यमयी गाँव भी कहा जाता है। मलाणा के निवासी खुद को सिकंदर के सैनिकों का वंशज और गाँव को दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र भी बताते है। उनके मुताबिक यहां भारतीय क़ानून नहीं चलते, यहाँ की अपनी संसद है जो सारे फैसले करती है। गाँव के लोग महाभारत काल के जमलु ऋषि की पूजा करते है जिन्होंने ये गाँव बसाकर लोकतान्त्रिक परंपरा की शुरुआत की थी। मलाणा भारत का इकलौता गांव है जहाँ मुग़ल सम्राट अकबर की भी पूजा की जाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक ख़ास बीमारी से परेशान अकबर का इस गाँव के किसी वैद्य ने इलाज़ कर जान बचाई थी जिससे खुश होकर अकबर ने मलाणा गाँव कोअपने शासनकाल में स्वतंत्र घोषित कर दिया था।

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सैलानियों के लिए हैं कई नियम-कानून

हर साल इस रहस्मय गाँव में हजारों देसी-विदेशी पर्यटक आते हैं मगर उनके रहने का यहाँ कोई सही इंतजाम नहीं है जिस कारण उन्हें गाँव के बाहर टेंट लगाकर रहना होता है. गांव में यदि किसी बाहरी व्यक्ति ने किसी चीज़ को छुआ तो जुर्माना देना पड़ता है। जुर्माने की रकम 1000 रुपए से 2500 रुपए तक कुछ भी हो सकती है। इस सब के लिए यहाँ नोटिस बोर्ड लगे हुए है।

पर्यटक दुकानों में न जा सकते हैं न सामान छू सकते हैं। उन्हें दुकान के बाहर से ही सामान मांगना पड़ता है। पैसे का लेन-देन भी यहाँ बिना छुए ही होता है।


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