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लखनऊ में होता हैं ईद की रस्मों अदायगी का अलग ही फलसफ़ा

By Manoj Tiwari

नवाबों का शहर लखनऊ भले ही आज मेट्रो सिटी की तर्ज पर विकसित हो रहा हो मगर आज भी यहाँ हर त्यौहार की रस्मों अदायगी का अपना अलग ही फलसफ़ा है। त्यौहार चाहे किसी भी धर्म का हो  लखनऊ के लोगों ने हमेशा सामाजिक समरसता का परिचय दिया हैं। तारीख गवाह है कि इस शहर में कभी भी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। वहीँ यहाँ आपसी भाई-चारे का यह आलम है कि शहर के लोग एक दूसरे के त्योहारों में बिना किसी भेदभाव के शरीक होते हैं। अपने अदब और तहज़ीब के लिए जाना जाने वाला ये शहर हर त्यौहार मनाने में बाकी शहरों के मुकाबले काफी अलग है। रमज़ान के मुबारक महीनें  को ही लीजिये, पूरे महीनें ये शहर एक अलग ही जश्न अपने अंदर समेटे रहता है। इस दौरान यहाँ का खानपान काफी अहम होता है। रोज़ेदारों के लिए यहाँ ख़ास तरह के जायके भी तैयार किए जाते है।

वैसे भी खानपान के मामले में हमेशा से लखनऊ की अपनी खास पहचान रही है। आज भी यहां के खाने में नवाबी अंदाज देखने को मिलता है। माना जाता है कि हर वो पकवान जो अन्य शहरों में भी मिलता है, लखनऊ में उसका अपना अलग ही ज़ायका होता है। गौरतलब है कि पहले आप की तहज़ीब और अदबपसंद लोगों के इस शहर ने आज भी दस्तरखान की अपनी रिवायत को बड़ी इज्ज़त से संजोये रखा है।
आइये आपको बताते हैं नवाबों के शहर के चंद नवाबी ज़ायकों के बारे में जिनकी बदौलत माह-ए-रमज़ान से लेकर ईद तक ये शहर लज़ीज़ व्यंजनों के स्वाद-सुगंध से गुलज़ार रहता है।

कश्मीरी चाय

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आमतौर पर कश्मीरी चाय चौक नक्खास और अमीनाबाद में सर्दियों के मौसम में मिलती है। मगर रमज़ान  में ये  रोज़ेदारों और लखनऊ घूमने आये पर्यटकों का पसंदीदा प्याला बन जाती है। अक्सर लोगों की जिज्ञासा कश्मीरी चाय के लखनऊ से कनेक्शन को लेकर देखी जाती है। आपको बताते चले कि नवाबों के वक़्त कई कश्मीरी लोग लखनऊ में आकर बस गए थे। उस मोहल्ले का नाम कश्मीरी मोहल्ला है। उनकी कश्मीरी चाय ने स्थानीय लोगों को खूब लुभाया। वहीँ जब स्थानीय लोगों ने इसे बनाना सीखा तो उसमें स्ट्राबेरी मिला कर लखनवी अंदाज दे दिया। जिस चलते इस चाय का रंग गुलाबी होता है।

बाकरखानी

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बाकरखानी मेवे और मलाई से बनी रोटी होती है। जिसकी शुरुआत नवाबों के वक़्त हुई थी। पुराने ज़माने में ये अमीरों के दस्तरखान का ज़ायका हुआ करती थी। जबकि आज के वक़्त ये पुराने लखनऊ में कई जगह मिल जाती है। इसे आधुनिक नान का जनक भी कहा जाता है।

तंदूरी कुलचे

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तंदूर में तैयार किए ये पराठों नर्म रहे इसलिए इन्हें पानी की छीटें दे कर घी से तर किया जाता है। ईरान से आई रोटी यानी कुलचा पर लखनऊवालों ने भी विशेष प्रयोग किये। कुलचा नाहरी के विशेषज्ञ कारीगर हाजी जुबैर अहमद के मुताबिक कुलचा अवधी व्यंजनों में शामिल खास रोटी है, जिसका साथ नाहरी बिना अधूरा है।

दूध फेनी

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दूध फेनी एक तरह से ईद और  रमज़ान में इस्तेमाल होने वाली सेवईं होती हैं। मशीन से  मैदे की सेवईं को निकाल उसे घी में तलकर हाथों से पुलिंदों में व्यवस्थित किया जाता है। बाद में सिर्फ दूध और मेवा मिलाकर खाया जाता है। लखनऊ की सबसे अनोखी सेवईं के नाम से मशहूर ये सेवईं पुराने लखनऊ के अलावा अन्य सभी जगहों पर मिल जाता है।

शीरमाल

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शीरमाल फारसी का शब्द है इसका अर्थ होता है. दूध से गूंथे आटे की रोटी। आमतौर पर इसे  मैदे, घी और शक्कर से बनाया जाता है। यहाँ शीर का अर्थ दूध है। यह बाजार में तैयार बना हुआ मिलता है। इसे गोश्त के साथ भी खाया जाता है। ईद में लोग इसे गोश्त के साथ खाते हैं। लखनऊ और हैदराबाद में रिश्तेदारी के चलते इसका चलन अब हैदराबाद में भी बढ़ गया है।

अंगूरदाना

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रोजा-इफ्तारी में इसका खूब चलन रहता है। अंगूरदाना दरअसल उड़द की दाल से बनने वाली मोटी बूंदी है। यह मीठी होती है। इसके अलावा इफ्तार में नुक्ती भी खूब खाई जाती है। यह बेसन से बनती है। इन दिनों सेव की तरह के खारे भी काफी पसंद किए जाते हैं।

 

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